Friday, September 5, 2014

शिक्षक दिन



आज पूरा भारतवर्ष शिक्षक दिन बड़े धूमधामसे मना रहा है। यह आनंद की बात है की बहोत दिनों के बाद शिक्षक दिन के अवसरपर इतनी उत्सवता आज दिखाई दे रही है। जिनके स्मरण में आज हम शिक्षक दिन मना रहे है वो भारत के द्वितीय राष्ट्रपति महामहीम डॉ सर्वोपल्ली राधाकृष्णन भारत के श्रेष्ठ विद्वान है। उन्होंने अपनी व्यावसायिक जीवनी की शुरुआत प्राथमिक शिक्षक के तौर पर की थी। भारत की लोकशाही ने ये दिखा दिया है की , लोकशाही के माध्यमसे एक शिक्षक भी राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च स्थान पर विराजित हो सकता है। डॉ सर्वोपल्ली राधाकृष्णनजी के जीवन के अनेक पैलू है। लेकिन एक विशेष पैलू पर मै लिखना चाहता हूँ। डॉ सर्वोपल्ली राधाकृष्णनजी ने जो उपनिषदोका अंग्रेजी भाषांतर किया है वो आज भी सर्वश्रेष्ठ जाता है। उसमे उन्होंने परब्रह्म की निरपेक्ष एकता बताने के लिए जो अंग्रेजी शब्द का प्रयोग किया है वो वैशिष्ट्यपूर्ण है। उन्होंने बताया है के एकता तो दो प्रकारकी है एक numerical है और एक absolute है परब्रह्म एक है लेकिन वह numerical one नहीं है।तो वो absolute one है। ऐसी बहोतसी बाते है की जो उनकी श्रेष्ठतम विद्द्वत्ता को प्रदर्शित करती है। उन्हें मेरा विनम्र अभिवादन।
मानवी जीवन में शिक्षक का स्थान बहोता ही महत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृतीने मातापिता के बाद मानव के आयुष्य में शिक्षक का आचार्य का स्थान प्रतिपादित किया है। आदर्ष पीढ़ी निर्माण हेतु उच्च गुणवत्ता पूर्ण ,चारित्र्यसम्पन्न ,शिक्षकोंकी आज आवश्यकता है। जो लोग उदरभरण के लिए नहीं तो आपने जीवनध्येय हेतु नयी पीढ़ी निर्माण हेतु सिखाने का काम करे । लेकिन दुर्भाग्यतावश ऐसी शिक्षकोंकी आज कमी है। दूसरी बात यहाँ है की जो उच्च गुणवत्ता प्राप्त लोग है वो सामान्यत: शिक्षकी क्षेत्रमें में आना पसंद नहीं करते । सामान्यत: जिनका किधरभी प्रवेश नहीं हो पाता शिक्षकी पेशामे आने की सोचता है।
वास्तविकतासे जो प्रज्ञा संपन्न है, जो श्रेष्ठतम गुणवत्ता संपन्न है ऐसे लोगोने इस क्षेत्र में आनेकी आवश्यकता है। लेकिन ऐसे लोग आते नहीं क्यों की इस क्षेत्र में प्राप्त होनेवाली सम्पत्ति, प्राप्त होनेवाला सन्मान इतर क्षेत्रोंके मुकाबले में बहोतही कम है। इस युग के बहोतसे शिक्षक बौद्धिक रूपसे आर्थिक रूपसे दीन - गरीब हुए है। इस शिक्षक दिन के अवसर पर यही मनोकामना व्यक्त करता हूँ की शिक्षकोंको पुरातन कालमे में भारतवर्ष में जो प्रतिष्ठा , थी वो पुन: प्राप्त हो।

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