Friday, December 12, 2014

स्वर्गीय नाथूरामजी की देशभक्ती

आज कल स्वर्गीय नाथूरामजी की देशभक्ती के बारे में संसद से लेकर चौराहे तक चर्चाए चल रहीं है। उन्होंने स्वर्गीय महात्मा गांधी जी की ह्त्या की वो संविधान के तहत गलत थी या बराबर थी इसका फ़ैसला न्यायपालीका कर चुकीं है और तदनुषंगिका सजा स्वर्गीय नाथूरामजी भुगत भी चुकें है । महात्माजी का भारतवर्ष के लीजो योगदान दिया है वो भी अनन्यसाधारण हैं। उस समय पाकिस्तान को रक्कम जो अदा करनी थीं उसके बारेमे उनका जो आग्रह था वो नैतिकता के अनुसार सही भी था, लेकिन राजनैतिक दृष्टीसे, मातृभूमी कीभक्ती दृष्टिसे वह गलत लगता है। क्यों की वचन परिपूर्तीकी उत्तरदायीता दोनोंही पक्षों पर होती है। जब भारत पाक विभाजन हुआ उस समय पाकिस्तानमें जो हिंदुओंका कत्ले आम हुआ उसे नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। और ऐसी पारिस्थितिके बावजूद भारत ने वचनपरीपूर्ती कराना गलत या बराबर था इसका उत्तर कोई भी दे सकता।
नाथूरामजी की और महात्माजिकी कोई निजी दुश्मनी नही थी , इतनाही ही नहीं तो ऐसा बतलाया जाता है की ह्त्या करनेके पहले नाथूरामजी ने महात्माजी को नमन दर्शन किया था। जो महात्माीजीका पाकिस्तान को रकम अदा करने हेतु जो आग्रह था उसी कारण वाश नाथूरामजीने महात्माजी की ह्त्या का निर्णय लिया था , ऐसा नाथूरामजी ने स्वयं न्यायपालीके के सामने बतलाया है। इन सब बातों का अंतर्मुखता से विचार किया तो ह्त्या करना वैधानिक ,न्यायिक दृष्टीसे अवश्य गलत था लेकिन उसका उद्देश्य motive भारत वर्ष के अच्छे के लिय था ऐसा लगता है। और हत्या के पहलेका उनके चरित्र का विचार किया जाए तो उनका संपूर्ण जीवन देसभक्ती से प्रेरित था। जब कोई कहता है की नाथूरामजी को देशभक्त कहना गलत है तब इन सभी बातो का विचार करना आवश्यम्भावी है। उन्होंने की हुई महात्माजी की ह्त्या और उनकी देसभक्ति इन दोनों बातों को अलग अलग सोचना चाहिए ऐसा मुझे लगता है। मै महात्मा गांधी ह्त्या का समर्थ नहीं करता हूँ। लेकिन नाथूरामजी के देशभक्ती के उपर आक्षेप लेना ये भी सही नहीं मानता हूँ।

Thursday, December 4, 2014

बौद्धिक विकास और हार्दिक विकास

प्रसिध्द भौतिक शास्त्रज्ञ स्टीफन हॉकिन्स ने एक साक्षात्कारमे बताया है की आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स पूरी मानवजाती को बहोता ही बड़ा खतरा बन सकता है। आगे जाकर उन्होंने यह भी बताया है की आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स पूरी मानवजाती को नष्ट भी कर सकता है। 
वास्तविक रूप से आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स( AI ) यह मानव का ही एक नवीनतम और असाधारण अविष्कारण है। शास्त्रज्ञ्योंने ही यंत्र को विचारशक्ति,पृथ:करणशक्ति प्रदान की है। और यह शक्ति बहोत ही प्रचंड है जिसका सामान्य आदमी चिंतन भी नहीं करा। कींतु यहआविष्करण भस्मासुर की तरह पूरी मनव जाती को खतरा बनने जा रहा है।
अब यह समय चुका है की हमें इसके उपर विचारमंथन करके इस भस्मासुर का प्रतिरोध करना चाहिए।
यह ऐसा क्यों हो सकता ? इस सदी में सभी लोग बौद्धिक और भौतिक विकास के पीछे भाग रहे है। बहोत ही कम लोग भावनिक, हार्दिक विकास के बारेमें सोचते है। बौद्धिक और भौतिक विकास मानवमात्र के लिए अवश्यम्भावी है , लेकिन बौद्धिक और भौतिक विकास काफ़ी नहीं नहीं है , उसके साथ भावनिक , हार्दिक विकास भी जरूरी है। बौद्धिक विकास और हार्दिक विकासमे जो अंतर है वो बताने के लिए एक एक उदाहरण देता हूँ। एक एक बार एक आदमीने उसकी नई गाड़ी फ्री सरवीसिंग हेतु गाड़ी के शोरूम में दे दी , फ्री सरवीसिंग के बाद उसके दोस्त ने पूछा -- फ्री सरवीसिंग के बाद आपकी गाड़ी कैसी चल रही है ? उसने बताया पहलेही अच्छी चलती थी। उन्होंने शोध किया तो पता चला की फ्री सरवीसिंग के समय नए पार्ट निकालके पुराने पार्ट गाड़ीमे बिठाए गए है। पार्ट निकालना उन्हें बिठाना यह हुआ बौद्धिक विकास। और उसी गाड़ी के पार्ट उसी गाड़ी को बिठाना यह हुअा हार्दिक विकास।
यदि मानव बौद्धिक और हार्दिक दोनों ही दृष्टीसे विकसित हुआ तो यह खतरा टल सकता है।

Friday, September 12, 2014

जैसी करनी वैसी भरनी

जिनके सत्ता साम्राज्य से सूर्य का कभी अस्त नहीं होता, ऐसी ख्याती रखने वाले ग्रेट ब्रीटन का ही विभाजन होने जा रहा है।  अच्छा हो रहा है या बुरा हो रहा है यह अभ्यास का विषय है।  लेकिन एक बात सुनिश्चित है की किये हुए कर्मो का फल भुगतना ही पडता है।  एक कहावत है जैसी करनी वैसी भरनी इस कहावत का प्रत्यय अमगजोंको आ रहा है । अंग्रेजोंने  हमेशाहि अलगाववाद की ही राजनीती की है।  विभाजन करो और राज करो (Divide and rule ) यही उनकी राजनीती का मूल मंत्र रह चुका है। यह बात तत्कालीन कुछ राजनेताओंके  समझ में न आने के कारण ही १५० साल तक अग्रोजोने भारतवर्ष पर राज किया।  और जब भारत छोड़ कर जाने का समय आया तब भी यही Divide and rule नीति का अवलम्ब उन्होने किया , और कूछ शीर्षस्थ राजनेताओंके स्वार्थपरायणता के कारण अंग्रज ऐसा नीति में सफल भी हुए।  और माँ भारती का दुर्भाग्यपूर्ण  विभाजन हुआ ,भारत पाक बटवारा हुआ। आज उनके किए हुए कर्मों का फल भुगतने का अवसर आया है।  आज अंग्रेजी राजनेता, उनके प्रधानमंत्री विभाजन न होने हेतु बहोत भागदौड़ - प्रयत्न करा रहे है।  विभाजन होगा या नहीं होगा यह बात समय और स्कॉटलैंड की जनता तय करेगी। लेकिन इस बात से इतना तो हुआँ की अंग्रेजो को विभाजकी क्या पीड़ा , क्या दु:ख होता इस बात की झलकियाँ तो देखने मिली।

Friday, September 5, 2014

शिक्षक दिन



आज पूरा भारतवर्ष शिक्षक दिन बड़े धूमधामसे मना रहा है। यह आनंद की बात है की बहोत दिनों के बाद शिक्षक दिन के अवसरपर इतनी उत्सवता आज दिखाई दे रही है। जिनके स्मरण में आज हम शिक्षक दिन मना रहे है वो भारत के द्वितीय राष्ट्रपति महामहीम डॉ सर्वोपल्ली राधाकृष्णन भारत के श्रेष्ठ विद्वान है। उन्होंने अपनी व्यावसायिक जीवनी की शुरुआत प्राथमिक शिक्षक के तौर पर की थी। भारत की लोकशाही ने ये दिखा दिया है की , लोकशाही के माध्यमसे एक शिक्षक भी राष्ट्रपति जैसे सर्वोच्च स्थान पर विराजित हो सकता है। डॉ सर्वोपल्ली राधाकृष्णनजी के जीवन के अनेक पैलू है। लेकिन एक विशेष पैलू पर मै लिखना चाहता हूँ। डॉ सर्वोपल्ली राधाकृष्णनजी ने जो उपनिषदोका अंग्रेजी भाषांतर किया है वो आज भी सर्वश्रेष्ठ जाता है। उसमे उन्होंने परब्रह्म की निरपेक्ष एकता बताने के लिए जो अंग्रेजी शब्द का प्रयोग किया है वो वैशिष्ट्यपूर्ण है। उन्होंने बताया है के एकता तो दो प्रकारकी है एक numerical है और एक absolute है परब्रह्म एक है लेकिन वह numerical one नहीं है।तो वो absolute one है। ऐसी बहोतसी बाते है की जो उनकी श्रेष्ठतम विद्द्वत्ता को प्रदर्शित करती है। उन्हें मेरा विनम्र अभिवादन।
मानवी जीवन में शिक्षक का स्थान बहोता ही महत्त्वपूर्ण है। भारतीय संस्कृतीने मातापिता के बाद मानव के आयुष्य में शिक्षक का आचार्य का स्थान प्रतिपादित किया है। आदर्ष पीढ़ी निर्माण हेतु उच्च गुणवत्ता पूर्ण ,चारित्र्यसम्पन्न ,शिक्षकोंकी आज आवश्यकता है। जो लोग उदरभरण के लिए नहीं तो आपने जीवनध्येय हेतु नयी पीढ़ी निर्माण हेतु सिखाने का काम करे । लेकिन दुर्भाग्यतावश ऐसी शिक्षकोंकी आज कमी है। दूसरी बात यहाँ है की जो उच्च गुणवत्ता प्राप्त लोग है वो सामान्यत: शिक्षकी क्षेत्रमें में आना पसंद नहीं करते । सामान्यत: जिनका किधरभी प्रवेश नहीं हो पाता शिक्षकी पेशामे आने की सोचता है।
वास्तविकतासे जो प्रज्ञा संपन्न है, जो श्रेष्ठतम गुणवत्ता संपन्न है ऐसे लोगोने इस क्षेत्र में आनेकी आवश्यकता है। लेकिन ऐसे लोग आते नहीं क्यों की इस क्षेत्र में प्राप्त होनेवाली सम्पत्ति, प्राप्त होनेवाला सन्मान इतर क्षेत्रोंके मुकाबले में बहोतही कम है। इस युग के बहोतसे शिक्षक बौद्धिक रूपसे आर्थिक रूपसे दीन - गरीब हुए है। इस शिक्षक दिन के अवसर पर यही मनोकामना व्यक्त करता हूँ की शिक्षकोंको पुरातन कालमे में भारतवर्ष में जो प्रतिष्ठा , थी वो पुन: प्राप्त हो।

Wednesday, August 27, 2014



दुस्तर्कात सुविराम्यतां    ………। 
सत्तर्क करावा पण कुतर्क करणे काही  उपयोगी नाही …. एकदा एका तर्कट माणूस व त्याचा मुलगा रात्री झोपलेले असतात . रात्री थंडी पडते ..... मुलाला जाग येते … तो उठून वडिलांना म्हणतो बाबा बाहेर  थंडी पडली आहे . खिडकी बंद करा ........... वाडील आळशी व तर्कट असतात ते उत्तर देतात अरे बाळा माझ्या खिडकी बंद करण्याने बाहेरची थंडी  थोडीच कमी होणार आहे ?  या तर्का पुढे मुलगा निरुत्तर होतो … तसे  तर हा कुतर्क तांत्रिक रीतीने योग्य आहे . पण काही कामाचा  म्हणून श्रीमदाद्य शंकराचार्य म्हणतात   दुस्तर्कात सुविराम्यतां श्रुतिमत्स्तर्कोनुसंधीयतां    ………।   

Monday, August 25, 2014

साई बाबा

साई बाबा देव आहेत  का नाहीत  वादाचा विषय आहे . अवतारत्व कोणास द्यावे त्याचे धर्मशास्त्रात खूप विवरण आहे  ,पूर्ण अवतार कोण ,अंश अवतार कोण ,अंशांशावतार  कोण ? इत्यादी बाबत सूक्ष्म विचार धर्मशास्त्रात आहे त्याविषयी कामाचे व बिनकामचे वाद सुरूचं आहेत ………… पण साई बाबांची मंदिर रूपी दुकाने थाटणे हे मला व्यक्तीश: योग्य वाटत नाही . एक परदेशी कंपनी अशी  दुकाने थाटू इच्छिते आहे असे ऐकिवात आहे ……  हे जर सत्य असेल तर याचा नक्कीच  विरोध करावा …………. तसेच शिर्डीस जे बाजारू रूप आले आहे ते सर्व श्रद्धेचा ओंगळवाणा बाजार मांडला आहे असे मला वाटते .                                                                   तसेच संत कोणाला म्हणावे ? ज्याला सत्याची समक्षता लाभलेली आहे त्यास संत म्हणावे …………. ज़्याला खरे काय आहे ते  समजले आहे व त्या ख-या गोष्टिचा अनुभव आला आहे त्यास संत म्हणावे ……। या अर्थाने साईबाबांच्या  चरित्राचा  विचार केल्यास ते संत आहेत व  वंदनिय आहेत .
                  आणि सगळ्यात महत्त्वाचे हे आहे की आपणा आपल्या श्रद्धनीय गोष्टीची पूजा करत असता दुस-यांच्या श्रद्धास्थानांवर संशय ही घेवू  नये व चिखलफेक ही करू नये . व कोणी आपल्या श्रद्धा स्थानावर चिखलफेक केली तर ते पण सहन करू नये ........ हे माझे व्यक्तिगत मत आहे . आपण योग्यायोग्यतेचा विचार करावा . 

पूतना

द्याच्या दिवशी म्हणजे भाद्रपद शुद्ध प्रतिपदेला भगवान पुतना राक्षसीणचा वध करतात . पुतना राक्षसीण भगवंताची मावशी कोणत्या नात्याने होते ?? आणि तिचा पुर्वजन्मोतिहास ………………………..
जेव्हा पूतना ( पूत = पवित्र …. ना =नाही जिचे अंत:करण पवित्र नाही ) भगवंताचे दर्शनास आली …… तेव्हा यशोदामातेने ओळख नसल्याने दर्शनास नाकारले ……तेव्हा तिने यशोदेस ती यशोदेचॆ बहीण आहे असे पटविले ( की जे वास्तव नव्हते ) म्हणून ती मावशी .......... आणि ती राजा बलीची नातेवाईक होती ( कोठे बहीण असा उल्लेख आहे तर कोठे मुलगी असा) जेव्हां वामनास तिने पाहेले तेव्हा तिचे मनात वात्सल्य भाव निर्माण झाला व जेव्हा देवाने बलीसा पाताळात धाडले तेव्हा तीच्या मनात वैर भाव जागृत झाला म्हणून पूतने च्या ठायी वात्सल्य व वैर असे दोन्ही भाव एकसामायावाच्छेदे करू न आहेत …। असे मला वाटते

Sunday, August 24, 2014

लोकांचे प्रकार

जगात चार प्रकारचे लोक असतात क़ांही लोक दुस-याच्या सुखाने सुखी होतात. ……  त्यांच्या बद्दल संत तुकाराम महाराज म्हणतात - तुका म्हणे सुख पराविया सुखे / अमृत हे मुखे स्रवतसे //               काही दुस-याच्या सुखाने दु:खी होतात ,त्यालाच मत्सर असेही म्हणतात …  ,काही लोक दुस-याच्या दु:खाने सुखी होतात …. एकदा एका गावात एक प्रतिष्ठित माणूस गावभर पेढे वाटत होता , पण प्रतिष्ठित माणूस असल्याने कोणाचे पेढे वाटण्याचे कारण विचारण्याचे धाडस  झाले  नाही शेवटी एकाने विचारले तुम्ही का पेढे वाटताय ?  आमदारकीचे तिकीट मिळाले  अपत्य प्राप्ती झाली , लोटरी लागली असे नेमके काय झाले की तुम्ही पेढे वाटताय ? ते म्हणाले की शेजारचा बंड्या   नापास झाला  म्हणून मी पेढे वाटतोय  हा प्रकार आहे दुस-याच्याअ दु:खाणे सुखी
 होणा-यांचा आणि शेवटचा प्रकार की काहे लोक दुस-याच्या दु:खाने  दु:खी होतात त्या लोकां बाबत संत तुकाराम महाराज म्हणतात - सत्य बोले मुखे / दुखवी आणिकांचे दु:खे //

Tuesday, August 19, 2014

Rajiv Gandhi

स्वर्गीय राजीव गांधी की जयंती पर उन्हें हार्दीक अभिवादन। राजीव गांधीजी की दूरदर्शिता के वजहसे ही आज भारतवर्ष इस मुकाम तक पहुंचा है। उन्होंने आदरणीय डॉ विजय भटकरजी की नेतृत्वमें में  सी-डेक,श्रीमान सॅम पित्रोदा के नेतृत्व में सी-डॉट ऐसी संस्थाओंकी जो स्थापना की उसी के कारण भारत देश आपने नाम के अनुरूप ( भा याने प्रभा याने ज्ञान और रत याने रमने वाला , भारत याने जो ज्ञान में रमनेवाला हैं। ) ज्ञान क्षेत्र -सॉफ्टवेयर,सूचना-प्रसारण तकनीकी में पूरे जगत में शीर्षस्थ स्थान पर आज पहुंचा है। मै उनकी राजकीय विचारधारासे सहमती नहीं रखता हूँ। फिरभी उनका देश के प्रगती प्रती जो अमूल्य योगदान है उसे याद करके मै उन्हें अभिवादन करता हूँ।

Friday, August 15, 2014

श्रद्धा

प्रथमत: अंधश्रद्धा या शब्दाचा विचार केला पाहिजे अंध + श्रद्धा असे दोन शब्द त्यात आहेत .श्रद्धा या शब्दात श्रत व धा असे दोन शब्द आहेत श्रत म्हणजे सत्य धा म्हणजे धारण करणे य़ा बाबत मला असा प्रश्न असा विचारावासा वाटतो की जर श्रद्धा सत्याला धारण करणारी तर तिला आंधळी कसे म्हणता येईल म्हणून अंधश्रद्धा हा शब्दाच (अंधळा डोळस) या शब्दाप्रमाणे चुक आहे . श्रद्धा या शब्दाचा शास्त्रीय अर्थ असा आहे की ज्यांच्या सत्यते बद्दल निश्चय आहे अशा व्यक्ती ग्रंथ या बद्दल असलेला जो पराकोटीचा विश्वास त्यास श्रद्धा म्हणतात .उदाहरणार्थ आपली आई जेव्हा आपल्याला सांगते की हे तुझे वाडील आहेत तेव्हा कोणाला  त्या व्यक्तीची डी एन ए टेस्ट करून खात्री करून घ्यावी असे वाटत नाही य़ाला श्रद्धा म्हणतात . आता प्लांचेट इत्यादी गोष्टी आहेत या श्रद्धा या सदरा खाली येत नाहीत तर या रूढी आहेत काही भारतीय आहेत तर काही पाश्च्यात्य  आहेत ज्या रूढी चुक आहेत त्या नक्कीचं सोडल्या पाहिजेत आणि आपण जेव्हा श्रद्धा ठेवतो तेव्हा ज्या व्यक्तीवर संप्रदायावर ग्रंथावर ठेवतो त्या आधी त्याच्या सत्यासत्यतेची खात्री करून मगच तेथे श्रद्धा ठेवावी असा नियम आहे .  विठठ्लाला साकडे घालणे ही अंधश्रद्धा नाही कारण देवास साकडे कोणत्या गोष्टॆकरिता घालावे की जी गोष्ट आपल्या हातात नाही .पाउस पडणे ईत्यादी गोष्टी निसर्ग( कोणी एका अद्भूत शक्ती ) नियंत्रित करते व ती शक्ती मानवाच्या वागण्या प्रमाणे त्या गोष्टी नियंत्रित कटारे त्यास ऋत असे म्हणतात व अद्भूत शक्तीचे प्रतीक म्हणून विठ्ठलाला साकडे विनंती केली जाते .प्रस्तुत मत हे माझे व्यक्तिगत मत आहे य़ोग्यायोग्यतेचा विचार आपण करावा । 
आरक्षण बारे में कुछ । ……
                आजकल बहोत  जाती के लोग आरक्षण की मांग कर रहे है। किन्तु इस झुंड में समाज का ऐसा भी वर्ग है की जो  आरक्षण की माँगा नहीं कहता है। यह सही है की इस समाजके संवर्गने जो कुछ  पाया है वो आपने बुद्धी के बल पर पाया है।
                जब किसी समाज को आरक्षण लाभ दिया जाता है उसका कारण उनकी सही ढंग में उन्नति हुई नहीं। लेकिन कभी कभी उस समाज अथवा जाती के लोग अनारक्षित जगह का भी फ़ायदा उठाते है क्यों कीआरक्षण के बिना ही वो उनकी इच्छित जगह पा सकते है । इस बजह से अनारक्षित जगह कम हो जाती है और आरक्षित जगह बढ जाती है। और आगे जा कर जब चाहे तब वो जरुरत पड़नेपर आरक्षण का लाभ पुन: उठा सकता है।
              यह अनारक्षित वर्गो के लिए अन्यायकारक है। इस लिये आरक्षण देते समय एक प्रावधान रखना जरूरी लगता है, एक तो आरक्षित वर्ग के लोगो को अनारक्षित जगह का फ़ायदा ना मिले। और यदि आरक्षित जाती का कोई आरक्षण का फ़ायदा नहीं चाहता है तो ये सिद्ध हुआ की उसे आपेक्षित उन्नत स्तर प्राप्त हुआ है। और आगे जाकर उसे और उसके आगेकी पीढीयो को आरक्षण का फ़ायदा ना मिले.
             ये मेरे निजी विचार है लेकिन इसापर विचार होना आवश्य है।